Thursday, November 29, 2007
उद्देश्यहीन
परीक्षाएं नज़दीक आ रहीं हैं. मगर मन है कि मानता ही नही है. चाहता हूं कि जम कर पढाइ करूं पर कर नहीं पाता. भीतर से धिक्कार इतना है कि पढने का ढोंग कर लेता हूं. पर जो जम कर पढाइ होती है वह नही हो पा रही है. उदासीनता का हाल यह है कि अस्पताल जाने का मन भी नही करता. समझ मे नही आता क्या करूं. उम्मीद बस इतनी है कि शायद जैसे जैसे समय बीतेगा वैसे वैसे मेरा मन पढाइ में और लगेगा.
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