लोगों में यह मान्यता है कि आजकल हिन्दी कोइ नहीं पढता.अंग्रेज़ी पत्र पत्रिकाओं ने भी इस भ्रांति को फ़ैलाने में काफ़ी मदद की है. आखिर उनका फ़ायदा भी इसी में है. अगर कोइ हिन्दी नहीं पढता तो इसका अर्थ यही होता है कि सब अंग्रेज़ी पढते हैं. फ़िर तो सारे प्रचार उन्हे ही मिलेन्गे.
सच बात तो यह है कि किसी भी भाषा में सबसे ज़्यादा पाठक पल्प फ़िक्शन के होते हैं. जो भी लोग अंग्रेज़ी पढते हैं सबके सब साहित्य नहीं पढते हैं. अधिकतर लोग सस्ते रोमाँचक उपन्यास पढते हैं.
हिन्दी भाषियों ने तो कभी अपने रोमाँचक साहित्य को साहित्य समझा ही नहीं. जबकी सच ये है कि आज यदि हिन्दी में कुच पढा जा रह है तो वो है वेद प्रकाश शर्मा जैसे लोगों को. समय कि आवश्यकता यही कहती है कि हम इन लोगों को उतना ही आदर दें जितना अंग्रेज़ी पढने वाले जेफ़री आर्चर सरिखे लोगों को देतें हैं
Saturday, November 3, 2007
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