आधुनिकता एवं व्यक्तिगत उत्थान के इस घोर युग में हम सब अपनी भाषा के एक प्रमुख बिन्दु पर ध्यान नहीं दे रहें हैं. यह है हमारी लिपि.
बचपन से लेकर यौवन तक, जितने भी पाठ पढें, भले ही हनुमान चालीसा हो या फ़िर चाचा चौधरी, देवनागरी लिपि सदैव हमारे साथ रहती है.
जब मैं बैगलोर में रहता था तो आते जाते कभी सरकारी बैंकों के तख्तों पर जब देवनागरी लिखी मिलती थी तो बडा आनंद आता था. मगर जमाना ऐसा बदला है कि अब हिंदी भाषी क्षेत्रों में भी हमारी लिपी लुप्तप्राय हो रही है.
यदि आप ध्यान दें तो पायेंगे कि हिंदी फ़िल्मों के आगे पीछे रोमन लिपी का ही प्रयोग हो रहा है. जो चैनल अपने आप को हिंदी कहते हैं वे भी कभी देवनागरी लिपि का प्रयोग नहीं करते हैं.
किसी भी सीरियल का एवं उसके कलाकारों का नाम देवनागरी में नहीं लिखा आता है.
हिंदी समाचार चैनल भी कमाइ तो हिंदी की खाते हैं और गुण अंग्रेजी का गाते हैं, नहीं तो वे टिकर के द्वारा दोनो हिंदी और अंग्रेजी में समाचार क्यों दिखाते हैं. आखिर अंग्रेजी वाले तो कभी हिंदी में टिकर नहीं चलाते!!
देवनागरी मात्र हिंदी की ही नही बल्कि सारे ग्रामीण भाषाओं कि लिपि है.
यदि यही माहौल रहा तो आज से दस साल के बाद, खासकर के शहरों में देवनागरी पढने वालों की संख्या बिल्कुल नगण्य हो जायेगी और हम एक और चिर संचित रत्न अपनी सामूहिक याद से खो देंगे.
Friday, April 25, 2008
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