संबंध के सच की कडवाहट
दबे पांव, न करके आहट
धीरे से जीवन में आयें
कटुक स्वाद तालु पर लायें.
छोड भी दूं पर जाउं कहां
हर कोन में फ़ैली पडी यहां.
है बचना दूभर इस सच से
है बचा कोइ खुद के रच से?
मेरी भी गलती थी माना,
पर पश्चाताप तो था ठाना?
फ़िर भी तुम जाने कहां गयी
मानो कवि से प्रेरणा गयी.
पवन कुमार शर्मा
Wednesday, April 16, 2008
Subscribe to:
Post Comments (Atom)

1 comment:
sambandho ke sach ko baya karti ek saral evm sugatih kavita..vry nice bro ... :)...lekin ek request hai aapse.. aapne likhna kyu chor diyaa.. phir se shuru kijiye plzz
Post a Comment