मुझे नही पता कि आप मे से कितने लोंगों ने विनय पत्रिका के बारे मे सुना है. मेरा विनय पत्रिका से वास्ता तब पहली बार पडा ज़ब मैने नवमी कक्षा में पहली बार तुलसी का पद पढा. वह पद मैं नीचे लिखता हूँ.
जाके प्रिय न राम-बैदेही
तजिये ताहि कोटी बैरी सम जद्यपि परम सनेही.
तज्यो पिता प्रह्लाद , विभीषण बन्धु, भरत महतारी
बलि गुरु तज्यो कन्त व्रज विनितन्ही, भये मुद मंगल कारी.
नाते नेह राम के मनियत सुह्रिद सुसेव्य जहां लौ
अंजन कहा आँख जेहि फुटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं.
तुलसी सो सब भाँति परम हित पुज्य प्रानते प्यारो
जासॊ होय सनेह राम पद, एतो मतो हमारो.
विनय पत्रिका एक भक्त एवं प्रभु के बीच दिल खोलकर सीधा संवाद है. इसकी खासियत यह है कि, प्रभु भक्ति के मार्ग पर होने वाले संशय का भी पता चलता है.
Sunday, September 9, 2007
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