Thursday, September 6, 2007

अंतर्ताना पर हिन्दी

मेरे मित्र श्री सचिन समैया जी ने मुझसे कहा कि मुझे हिन्दी में ब्लोगिंग करना चाहिये. उनका मान रखते हुये मैं आज अपने पहले हिन्दी ब्लोग की शुरुआत मैं दिनकर जी की इन पंक्तियों को उद्ध्रित करते हुये करूँगा - शायद हमारे वामपंथी नेता इन्हे पढकर कुछ सीख ले सकेंगे,
क्षमा दया तप त्याग मनोरथ सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे कहो कहां कब हारा‍
क्षमाशील हो रिपु समझ तुम विनित हुए जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको कायर समझा उतना ही
क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंत हीन विषहीन विनित सरल हो
तीन दिवस तक पंथ मांगते रघुपती सिन्धु किनारे
बैठे पढते रहे छंद अनुनय के प्यारे प्यारे
उत्तर मे जब एक नाद भी उठा नही सागर से
उठी धधक पौरुष की आग राम के शर से
सिन्धु देह धर त्राही त्राही करता आ गिरा शरण मे
चरण पूज दासता ग्रहण की बंधा मूढ बंधन मे
सच पूछो तो शर मे ही बसती है दीप्ती विनय की
धर्म वचन पुरुषार्थ उसी का जिसमे शक्ती विजय की

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